हम सब इंसानों में वह ताकत है कि संघर्ष भरी हर कहानी को, फिर चाहे वह आसमान पर हो या जमीन के किसी मुश्किल रास्ते पर, उसे सुखद अंत दे सकते हैं
इ स बुधवार की शाम को हममें से अधिकांश लोगों ने भारतीय आसमान में हुए एक ‘हाई ड्रामा’ के बारे में सुना या देखा होगा, जब दिल्ली से बेंगलुरु जा रही इंडिगो की फ्लाइट में एक बच्चे का जन्म हुआ। एयरक्राफ्ट में महिला डॉक्टर की मदद से क्रू ने सुनिश्चित किया कि फ्लाइट में होने वाले इस दुर्लभ प्रसव की कहानी का सुखद अंत हो।
मामला फ्लाइट 6ई 122 के दिल्ली से उड़ान भरने के एक घंटे बाद शुरू हुआ। जब महिला यात्री को प्रसव पीड़ा शुरू हुई, तो विमान परिचारकों ने फुर्ती दिखाते हुए मिनटों में एक तरह का मिनी-हॉस्पिटल तैयार कर दिया। फ्लाइट कैप्टन के निजी अकाउंट पर मैंने इसके बारे में पढ़ा, जिन्होंने बड़े उत्साह के साथ फ्लाइट में मौजूद रियाद के प्लास्टिक सर्जन डॉ. नागराज और महिला व प्रसूति विशेषज्ञ डॉ. शैलजा के बारे में बताया, जिन्होंने सुरक्षित प्रसव में मदद की। कहानी की शुरुआत तब हुई, जब विमान जयपुर के ऊपर से गुजर रहा था। उस समय उन्हें दर्द शुरू हुआ और भोपाल के उत्तरी हिस्से तक पहुंचते ही स्थिति धीरे-धीरे डॉक्टरों के हाथ से निकलने लगी।
यहां तक कि कैप्टन ने आपात स्थिति के बारे में सारे एयर ट्रैफिक कंट्रोल को सूचित कर दिया पर वह डॉक्टर्स के अंतिम निर्णय का इंतजार कर रहे थे ताकि तय कर सकें कि विमान को नजदीकी एयरपोर्ट इंदौर, हैदराबाद या नागपुर में उतारा जाए या बेंगलुुरु की उड़ान जारी रखी जाए। विमान में ऐसा एक भी व्यक्ति नहीं था, जिसने उस क्षण अनजान बच्चे के लिए प्रार्थना नहीं की हो। सारे एयर ट्राफिक कंट्रोलर्स, विशेष तौर पर नागपुर ने विमान को बेरोकटोक हाई स्पीड रन की इजाजत दी और आखिरकार विमान ने बेंगलुुरु एयरपोर्ट पर बिना टिकट के एक अतिरिक्त यात्री के साथ लैंड किया!
पर मुझे यकीन है कि आपमें से अधिकांश लोगों ने ठीक 24 घंटे पहले जन्मे एक और बच्चे के बारे में नहीं सुना होगा, जिसके जन्म के समय भी लोगों के रोंगटे खड़े हो गए थे और आसपास मौजूद सभी लोगों ने उसके लिए प्रार्थनाएं की। यहां उसकी कहानी है।
बंगाल के पश्चिमी बर्द्धमान के गांव राजबंध में रहने वाली 26 वर्षीय रजनी सरकार को मंगलवार को प्रसव पीड़ा शुरू हो गई। रजनी के पति और लोहे के शटर मैकेनिक दिलीप ने उसे दुर्गापुर के सब-डिवीज़नल हॉस्पिटल ले जाने के लिए एंबुलेंस को फोन किया, यह रजनी के गांव से महज 15 किमी दूर है और काफी विकसित जगह है। पर एनएच 2 से गांव आ रहे ड्राइवर को लगा कि आगे कीचड़ से भरी सड़क में एंबुलेंस फंस सकती है और उसने खुद ही हाइवे पर गाड़ी रोक दी। चूंकि एंबुलेंस समय पर नहीं पहुंची, ऐसे में गांव की कुछ महिलाओं की मदद से रजनी ने घर पर ही बच्चे को जन्म दिया, लेकिन ब्लीडिंग बंद नहीं हो रही थी, घबराए दिलीप ने इस बार स्ट्रेचर मंगवाने के लिए ड्राइवर को फोन किया।
गांव के युवा मदद के लिए आगे आए और उनमें से चार लोग रजनी और नवजात बच्चे को गांव की कच्ची सड़क से होते हुए 1.5 किमी दूर एनएच 2 पर खड़ी एंबुलेंस तक ले गए। स्ट्रेचर पर मां और नवजात को ले जाते लोगों का वीडियो इंटरनेट पर सामने आने के बाद ग्रामीणों में आक्रोश पैदा हुआ और तब जाकर स्थानीय ग्रामीण इकाई ने बुधवार को सड़क की तुरंत मरम्मत करवाने की घोषणा की।
जिस दिन वह मां-बेटा बेंगलुरु एयरपोर्ट पर सुरक्षित पहुंचे, ठीक उसी दिन से यह मां-बेटा भी डॉक्टर्स की देखरेख में जल्दी ठीक हो रहे हैं। इन दो मार्मिक कहानियों के सुखद अंत के पीछे मानवीय प्रयास ही हैं।फंडा यह है कि मिलकर, हम सब इंसानों में वह ताकत है कि संघर्ष भरी हर कहानी को, फिर चाहे वह आसमान पर हो या जमीन के किसी मुश्किल रास्ते पर, उसे सुखद अंत दे सकते हैं!
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