सत्य के प्रति समर्पित एक लहर पूरे समुद्र का स्वभाव बदल सकती है, वर्तमान में ऐसी लहर कहीं नजर नहीं आती
इं टरनेट पर मराठी भाषा में बनी फिल्म ‘आघात’ देखने का अवसर मिला। फ़िल्मकार विक्रम गोखले ने फिल्म में नकारात्मक भूमिका अभिनीत की है। ज्ञातव्य है कि विक्रम गोखले की 3 पीढ़ियां रंगमंच और सिनेमा में सक्रिय रही हैं। इस फिल्म में प्राइवेट अस्पताल में की जा रही लूट व मरीज के शोषण की बात प्रस्तुत है। दूसरी ओर सरकारी अस्पताल भी भ्रष्टाचार और लाल फीतेशाही में बंधे हैं।
‘आघात’ में मुक्ता बर्वे अभिनीत पात्र शल्यक्रिया टीम की सदस्य हैं। डॉ. विक्रम की शिष्या रह चुकी हैं। एक 22 वर्षीय युवा लड़की इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती हुई है। वह ऑपरेशन से इंकार करती है। मुक्ता बर्वे अभिनीत युवा डॉक्टर मरीज से मित्रता कर ऑपरेशन के लिए रजामंद करती है। अनुभवी डॉ. गोखले अपनी टीम के साथ ऑपरेशन करते हैं।
पैथोलॉजी विभाग से जानकारी मिली है कि उसकी एक ओवरी में मारजिनल कैंसर है। डॉ. गोखले वह ओवरी निकाल देते हैं और उन्हें शंका है कि दूसरी ओवरी भी कैंसर ग्रस्त हो सकती है। अत: वह उसे भी निकालने का आदेश देते हैं। मुक्ता बर्वे अभिनीत डॉक्टर इसका विरोध करती है।
ऑपरेशन थिएटर में नाटक समान द्वंद चलता है। एक सिरे पर अनुभव है तो दूसरे सिरे पर करुणा। मोबाइल पर ही पैथोलॉजी विभाग से संपर्क किया जाता है। विभाग से सूचना मिलती है कि अभी तक दूसरी ओवरी रिपोर्ट आई नहीं है। अहंकारी डॉ. गोखले मरीज की दूसरी ओवरी भी निकाल देते हैं।
होश आने पर मरीज को जानकारी मिलती है कि वह कभी मां नहीं बन सकती। उसका प्रेमी उसे यकीन दिलाता है कि उससे उसे अंतर नहीं पड़ता। युवा लड़की मानसिक संतुलन खोकर आत्महत्या करना चाहती है। मुक्ता बर्वे और मरीज का परिवार उसे आत्महत्या करने से बचा लेता है।
मुक्ता अभिनीत पात्र डॉ. स्मिता प्रकरण को मेडिकल काउंसिल ले जाती है। प्राइवेट अस्पताल की प्रबंधक उसे रोकती है। सेवा से निकालने की धमकी देती है परंतु सत्य के प्रति समर्पित युवा डॉक्टर मेडिकल काउंसिल को प्रकरण भेज देती है। मेडिकल काउंसिल एक तरह का न्यायालय है। अभिनेता किरण कुमार अभिनीत पात्र इस न्यायालय के प्रमुख जज हैं।
डॉ. गोखले पैथोलॉजी विभाग के अध्यक्ष को कहता है कि वह उसकी अगले वर्षों की कमाई का 50 फीसदी देगा। इस तरह अनुभवी डॉक्टर हर तरह से अपने को बचाने के जतन करता है। अस्पताल की अध्यक्षा, मुक्ता बर्वे अभिनीत पात्र पर दबाव डालती है कि वह प्रकरण वापस ले ले। वह सत्य को समर्पित है।
मेडिकल काउंसिल में अन्य डॉक्टरों के दिए गए बयान से डॉ. गोखले को निर्दोष पाया जाना लगभग तय है। यहां तक कि किरण कुमार भी डॉ. मुक्ता से कहते हैं कि उसे प्रकरण वापस लेना चाहिए। वह अडिग रहती है निर्णय देने के समय पैथोलॉजी के डॉक्टर का जमीर जागता है। वह कहता है कि दूसरी ओवरी पूरी तरह स्वस्थ थी।
वह यह भी स्वीकार करता है कि लोभ-लालच के प्रस्ताव ने उसे डिगा दिया था। ठीक उसी समय एक अन्य डॉक्टर बताता है कि डॉ. गोखले मुंबई के एक प्राइवेट अस्पताल में किडनी रैकेट में शामिल थे। उन्हें त्याग-पत्र देने का अवसर दिया गया और वे इस पतली गली से निकल भागे। इस तरह पूरा प्रकरण बदल जाता है।
डॉ. गोखले को दोषी पाया जाता है। उनका लाइसेंस रद्द कर दिया जाता है। डॉ. गोखले अपने घर लौटते हैं। उनकी पत्नी अपने कमरे का दरवाज़ा बंद कर लेती है। पत्नी का यह कदम ही अहंकार पर असली आघात है।
दरअसल एक गंदी मछली को तालाब से तुरंत बाहर निकालना चाहिए। सत्य के प्रति समर्पित एक लहर पूरे समुद्र का स्वभाव बदल सकती है। वर्तमान में ऐसी लहर कहीं नजर नहीं आती। चिकित्सा एक महान शास्त्र है। यह फिल्म केवल एक अपवाद प्रस्तुत करती है। महामारी के 8 महीनों में एक मेडिकल कॉलेज या अस्पताल का शिलान्यास तक नहीं हुआ।
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