दशकों पूर्व ‘वेली ऑफ डॉल्स’ नामक उपन्यास प्रकाशित हुआ था जिसमें गांजे-अफीम का नशा करने वालों के दुख और डरावने सपनों का विवरण दिया गया था। फिरोज खान की ‘जांबाज’ में श्रीदेवी अभिनीत पात्र को जबरन नशे के इंजेक्शन दिए जाते हैं। आज ट्विंकल खन्ना ने अपने लेख में ‘आईलैंड आफ डॉल्स’ का जिक्र किया है। मेक्सिको से कुछ दूर एक जगह पर भांती-भांती की गुड़ियें दरख्त पर लटकी हैं। उस स्थान पर किसी अबोध बालिका के साथ दुष्कर्म हुआ था।
कातिल ने उसकी गुड़िया को दरख्त पर लटका दिया था। पर्यटक भी डॉल्स दरख्त पर लटकाकर मृतक को आदरांजलि देते हैं। आजकल उत्तर प्रदेश में दुष्कर्म हो रहा है। इस समय सीबीआई का उत्तरदायित्व बढ़ गया है। विभाग सक्रिय है। जांच की रपट कभी प्रकाशित नहीं हो पाती। इन घटनाओं से देश की गिरती हुई जर्जर अर्थव्यवस्था की ओर किसी का ध्यान ही नहीं जाता। जवाबदार पतली गली से निकल जाते हैं।
हॉरर कथाएं भी उतनी ही पुरानी हैं, जितनी मॉयथोलॉजी। सबसे छोटी और भूत कथा ऐसी है कि दो व्यक्ति नदी किनारे बात कर रहे हैं। एक व्यक्ति कहता है कि ‘मैं भूत प्रेत में विश्वास नहीं करता’। उसका साथी कहता है कि वह भी भूत-प्रेत में विश्वास नहीं करता। इतना कहते ही वह गायब हो जाता है। एक रपट ऐसी आ सकती है कि सारे दुष्कर्म भूत कर रहा है। इस तरह अपराध को काल्पनिक भूत कथा से जोड़कर सबको निर्दोष घोषित किया जा सकता है।
गिरीश कर्नाड की फिल्म ‘संस्कार’ दो बालसखा ब्राह्मणों की कथा है। दोनों ही समान रूप से पढ़े-लिखे थे। उनमें से एक मित्र एक दलित स्त्री से प्रेम करता है और उसी की बस्ती में रहने लगता है। कालांतर में उसकी मृत्यु हो जाती है। दलित स्त्री अपने स्वर्गवासी प्रेमी की अंतिम क्रिया के विषय में उसके मित्र से पूछती है कि दाह संस्कार बामन ढंग से किया जाए या वे उसे दलित शवदाहग्रह में ले जाए। दुविधा यह है कि वह जन्म से ब्राह्मण है परंतु उसने सारी उम्र दलितों की बस्ती में काटी है। मित्र निर्णय के लिए समय मांगता है। सोच-विचार कर नदी में स्नान करने जाता है शायद नदी ही उसे उत्तर खोजने में मदद करेगी।
उसी समय दूसरे घाट पर वह दलित स्त्री स्नान कर रही है। उस स्त्री का सुगठित शरीर उसे एक नदी जैसा लगता है। उसे अपने स्वर्गवासी मित्र से ईर्ष्या होती है कि उसने अपना जीवन कितने आनंद से बिताया। वह पंचायत में निर्णय देता है कि उसके मित्र का दाह संस्कार ब्राह्मण रीति रिवाज से हो।
राज कपूर की ‘प्रेम रोग’ में एक सामंतवादी व्यक्ति दलित स्त्री के साथ हमबिस्तर होता है और उसे थोड़े से पैसे देता है। उसकी पत्नी कहती है कि वैसे दलितों पर अत्याचार करते हो उन्हें अछूत मानते हो परंतु उनके साथ हमबिस्तर होने में ऐतराज नहीं है और उस स्त्री को खाली बोतल की तरह फेंक देते हो। अंतिम सीन में बड़े राजा ठाकुर अपने अत्याचारी छोटे भाई को स्वयं ही गोली मारकर मरे हुए भाई की खुली आंख को बंद करते समय कहते हैं कि ‘काश समय रहते उसकी आंखें खुल जातीं’।
महमूद ने ‘भूत बंगला’ नामक हास्य फिल्म बनाई थी, जिसमें संगीतकार राहुल देव बर्मन ने एक भूमिका की थी। एक गीत था ‘मैं प्यासा हूं, खून पीऊंगा। अब कहां जाओगे, कहां आ गए हम दोनों, इधर भी डर उधर भी डर, कहां आ फंसे।
आश्चर्य है कि तर्क सम्मत जीवन शैली में विश्वास करने वाले अमेरिका में भी भूत-प्रेत साहित्य, फिल्में रची गई हैं। जर्मनी जैसे आधुनिक देश में डॉ. नीज ने पुनर्जन्म अवधारणा पर बहुत कुछ लिखा है
बहरहाल उत्तरप्रदेश में दुष्कर्म को एक संगठित व्यापार का दर्जा देकर देश की निरंतर गिरती हुई जीडीपी को सुधारने का प्रयास किया जा सकता है। हमारे देश के त्रिकालदर्शी कवि कबीर की वाणी है- ‘चंदा मरिबे, सूरज मरिबे, मरिबे सकल संसार’।
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