आइवरी कोस्ट नामक देश के दो भाग हैं, उत्तर कोस्ट और दक्षिण कोस्ट। कुछ हद तक यह नार्थ कोरिया और दक्षिण कोरिया जैसा मामला है। अधिकांश इसी तरह बंटे हैं। भारत में भी सरहदें सुलगती हैं। निदा फ़ाज़ली की रचना है, ‘दिल मंदिर भी है, दिल मस्जिद भी है, यह बात सियासत क्या जाने, इंसान की मोहब्बत क्या जाने’।
सारी भौगोलिक सरहदें मनुष्य के द्वारा बनाई गई हैं। यह प्रकृति का रेखागणित नहीं है। बहरहाल आइवरी कोस्ट में फुटबॉल लोकप्रिय खेल है। एक प्रतियोगिता दोनों हिस्सों के खिलाड़ियों ने मिलकर जीती थी। एक खिलाड़ी ने बयान दिया कि आपस में लड़ते रहने से बेहतर है कि हम मिल कर रहें।
कल्पना कीजिए कि भारत और पाकिस्तान का बंटवारा नहीं होता तो सुनील गावस्कर, वकार और इम्तियाज अली एक साथ खेलते और टीम हर मुकाबला जीत जाती। दोनों देशों ने भीतरी हालात सुधारने के बदले हथियार खरीदे और एक-दूसरे के बीच बैलेंस आफ टेरर बनाए रखा।
गरीबी, अन्याय और असमानता दोनों जगह एक सी हैं। हड़बड़ाहट में इन दोनों ने बारूद के गोदाम पर माचिस को पहरेदार बनाए रखा। दोनों के पास आणविक शस्त्र हैं और किसी एक का पागलपन पूरी मानवता को खतरे में डाल सकता है। चुनाव आधारित राजनीति में मानवीय करुणा का कोई स्थान नहीं है। हमने खेलों को भी बांट दिया है। क्रिकेट व गोल्फ अमीरों के खेल हैं। फुटबॉल गरीब का प्रिय खेल है, क्योंकि मात्र एक फुटबॉल से यह खेला जा सकता है।
आइवरी कोस्ट के खिलाड़ी के बयान को बार-बार दोहराया गया और उसका प्रभाव भी पड़ा। दरअसल उस खिलाड़ी को शांति का नोबेल प्राइज दिया जाना चाहिए था। महात्मा गांधी का नाम भी नोबेल के लिए तीन बार प्रस्तावित किया गया परंतु आहत पश्चिम की ताक़तों ने गांधी को शांति पुरस्कार से वंचित रखा। गांधी जी को किसी पुरस्कार की कामना भी नहीं थी। दक्षिण अफ्रीका के जिस शहर में उन्हें रेल के प्रथम श्रेणी डिब्बे से बाहर फेंका गया था, उस स्थान पर भी उनकी मूर्ति स्थापित है।
गांधीजी की संत छवि कुछ ऐसी है कि उनकी हत्या के लिए जवाबदार राजनीतिक विचारधारा के हिमायती भी उनका गुणगान करने के लिए बाध्य हैं। जिन दिनों यह कहावत लोकप्रिय बनी कि पढ़ोगे-लिखोगे तो बनोगे नवाब, खेलोगे-कूदोगे तो बनोगे खराब, उन दिनों की शिक्षा नीति और प्रणाली सार्थक थी। आज शिक्षा का जो हाल है, उसे देखकर लगता है कि खेलते रहना ही बेहतर है। पश्चिम के देशों में फुटबॉल के खिलाड़ी अरब पति हैं। भारत में भी क्रिकेट के खिलाड़ी करोड़पति हैंं। कबड्डी और खो-खो कम खेले जाते हैंं। राजनीति क्षेत्र में दोनों खेल बहुत लोकप्रिय हैंं।
प्रकृति संरक्षण के हित में गोल्फ प्रतिबंधित किया जाना चाहिए। इस खेल के लिए एकड़ों जमीन को हरा-भरा बनाए रखने के लिए पानी की आवश्यकता है। खेल का ठाठ देखिए कि खिलाड़ी के साथ उसका सामान ढोने वाला सेवक चलता है। उसे ‘कैंडी’ कहते हैं, यह खेल सामंतवाद की दुम है जो अभी भी फड़फड़ाती है। खेलों ने पेय भी बदल दिए हैं। क्रिकेटर कम नशे वाली बीयर पीता है। फुटबॉल का खिलाड़ी खाटी रम पीता है। गोल्फ खिलाड़ी पिंक शैम्पैन पीता है। फुटबाल प्रशंसक मैच के बाद आपस में भिड़ जाते हैं। कोलकाता में एक दंगा हो चुका है। यह खेद जनक है कि क्रिकेट के थर्ड अंपायर से भी चूक हो जाती है। खाकसार खंडवा में मंडलोई कप खेलने गया था। खंडवा की टीम के विकेटकीपर कलेक्टर थे और अंपायर उनका क्लर्क था। अब भला कलेक्टर अपील करे तो क्लर्क की क्या हिम्मत की वह उनकी अपील अस्वीकार करे!
एक दौर में बाढ़ पीड़ितों की सहायता के लिए सितारों का क्रिकेट मैच हुआ। नरगिस और वैजयंती माला की गेंदबाजी पर दिलीप कुमार ने शॉट खेला और दोनों कैच राज कपूर ने लपक लिए। उस समय सायरा बानो कमसिन थीं और खेल में शामिल नहीं थीं।
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