उत्तराखंड में मदरसों की लंबी कतार थी। कुछ समय पहले तक वहां सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार 2 लाख 61 हजार 8 सौ मदरसे होते थे। कई दशकों से मदरसों में पढ़ने वाले बच्चों को हर महीने सरकारी खजाने से छात्रवृत्ति दी जा रही थी। फिर एक दिन उत्तराखंड सरकार ने इन बच्चों के बैंक खातों को आधार कार्ड नंबर के साथ जोड़ने के लिए कहा। फिर क्या था? 88 प्रतिशत मदरसे अपने छात्रों समेत गायब हो गए। साढ़े 14 करोड़ रुपए की सरकारी छात्रवृत्ति भी अब घटकर केवल 2 करोड़ रह गई है।
नपेगा 30 और 31 (ए) भी !
अनुच्छेद 30 और 31(ए) समाप्त करने के लिए चिंतन-मनन की शुरुआत केंद्र सरकार के शीर्ष स्तर पर हो चुकी है। इन अनुच्छेदों के तहत कुछ संस्थानों को अल्पसंख्यक संस्थान होने का दर्जा मिलता है! जबकि संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 में सभी को समान अधिकार देने की बात कही गई है। सेंट स्टीफेंस कॉलेज और एएमयू इसके उदाहरण हैं। इन्हें मिले विशेषाधिकारों के कारण रामकृष्ण मिशन तक ने स्वयं को अल्पसंख्यक संस्थान की हैसियत से दर्ज कराया है। आगे देखिए क्या होता है।
गीताविद् अर्थशास्त्री
अर्थशास्त्री बिबेक देबरॉय हालांकि प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के अध्यक्ष हैं, लेकिन प्रधानमंत्री भगवत गीता पर उनके ज्ञान और उनके गीता बोध से मुग्ध हैं। बिबेक ने गीता का अनुवाद किया और अब यह पुस्तक उपलब्ध है। बिबेक ने उप गीता का विषय भी उठाया। बिबेक ने हाल ही में महाभारत का विशाल अनुवाद किया है, जिसके कई खंड हैं। यह बहुत भारी भरकम कार्य था। सुना गया है कि जब समय मिलता है, तब प्रधानमंत्री उनके साथ अर्थशास्त्र के मुद्दों के अलावा गीता पर भी चर्चा करते हैं। प्रधानमंत्री की भी भागवत गीता में भारी रुचि है। जीएसटी के बाद प्रधानमंत्री ने एक बार कहा भी था कि जीएसटी के भी 18 अध्याय हैं और गीता में भी 18 अध्याय हैं।
अरे आप भी विद्वान हैं
पश्चिम बंगाल में चुनाव की आहट मिलते ही बीजेपी में बहुत से लोग सक्रिय हो गए हैं। उनमें से कुछ ऐसे हैं जिन्हें संघ के एक वरिष्ठ अधिकारी चॉकलेटी नेता कहकर पुकारते हैं। लेकिन हर चॉकलेट का अपना अलग अंदाज होता है। नई चॉकलेटों ने गणेश परिक्रमा का भी नया तरीका खोज लिया गया है। चॉकलेटी नेता अपनी जेबी संस्थाओं के जरिए किसी विषय पर पार्टी के ऐसे नेताओं के भाषण आयोजित करवाते हैं, जिनकी टिकट दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। अधिकांशतः इन नेताओं का इन विषयों से संबंध नहीं होता है, लेकिन यह अहसास तो करा ही दिया जाता है कि आप भी बौद्धिक भाषण दे सकते हैं। असली टैलेंट भी इसी में है।
खतरनाक प्रेस कॉन्फ्रेंस
कृषि संबंधी विधेयकों पर पर केंद्रीय मंत्रियों का राज्यों में जाना कई जगह उल्टा पड़ गया। मंत्रियों को हर राज्य की राजधानी में प्रेस कॉन्फ्रेंस करनी थी। बहुत से मंत्री ऐसे हैं जिन्हें ‘राष्ट्र के नाम संदेश’ जारी करने की आदत है। राज्य इकाइयों ने सलाह भी दी कि अगर प्रेस से न मिलें, तो अच्छा रहेगा। मित्र पत्रकारों ने भी ऐसा ही कहा। केंद्रीय कानूनों पर तो उन्होंने संभाल लिया, लेकिन प्रादेशिक मामले उल्टे पड़ गए। अब राज्य इकाइयां किसी तरह रायता समेटने में लगी हुई हैं।
चलते-चलते - चीनी गुगली को डिफेंड करने के चक्कर में एक भाजपा नेता हिट विकेट आउट हो गए। पहेली बुझाने का कोई इनाम नहीं।
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