रामविलास पासवान के निधन के बाद केंद्रीय मंत्रिपरिषद में रामदास आठवले के रूप में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठजोड़ (राजग) के गैर-भाजपा घटकों का केवल एक प्रतिनिधि रह गया है। शिवसेना बाहर जा चुकी है। अकाली दल ने हाल ही में इस गठजोड़ से नाता तोड़ लिया है। बिहार विधानसभा चुनाव में भाजपा ने लोक जनशक्ति पार्टी को शिखंडी की भूमिका देकर उसकी आड़ में नीतीश कुमार के शिकार की असाधारण रणनीति अख्तियार की है।
किसी गठजोड़ केे भीतर चलाया जाने वाला यह एक अनूठा दांव है। ज़ाहिर है कि नवंबर खत्म होते-होते तय हो जाएगा कि बिहार के कितने दल राजग के सदस्य रह पाएंगे। अगर भाजपा नीतीश से मुख्यमंत्री पद छीनने में सफल हुई, तो संभव है कि जनता दल (एकी) भी राजग का सदस्य न रहे। कुल मिलाकर देश का सबसे ताकतवर सत्तारूढ़ गठजोड़ बिखराव की कगार पर है। इसकी नेता, भाजपा ही इसे विखंडन की ओर धकेल रही है। उसकी दिलचस्पी इसे औपचारिक रूप से कायम रखने में ही है। शायद इसीलिए वह आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी से बात कर रही है ताकि केंद्र सरकार में गैर-भाजपा प्रतिनिधित्व दिखावे के लिए तो बढ़ा ही सकें। लेकिन राजनीतिक प्रेक्षक जानते हैं कि आंध्र में संघ परिवार नेपथ्य में रहकर भाजपा को नंबर एक पार्टी बनाने की ज़बरदस्त मुहिम में लगा है। त्रिपुरा के बाद उसका निशाना दक्षिण भारत का यही प्रदेश है। जैसे ही जगन मोहन को भाजपा की यह प्रगति खतरनाक लगी, वे भी राजग से दूरी बना लेंगे।
अस्सी के दशक में क्षेत्रीय पार्टियों ने कांग्रेस के आक्रामक वर्चस्वी केंद्रवाद के खिलाफ उदीयमान भाजपा का साथ देने का रुझान दिखाया था। उन दिनों लालकृष्ण आडवाणी संघवाद और सरकारिया कमीशन की भाषा बोलते थे। इन्हीं क्षेत्रीय शक्तियों की मदद से वाजपेयी छह साल प्रधानमंत्री रहे। राजग के कारण भाजपा को होने वाले राजनीतिक लाभ के कारण ही आडवाणी ने ‘एनडीए प्लस-प्लस’ (गठजोड़ की शर्तों पर भाजपा की राजनीति) की रणनीति का सूत्रीकरण कर भाजपा के भविष्य को इस गठजोड़ से बांध दिया। लेकिन, 2013 में प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनते ही नरेंद्र मोदी ने रणनीति का फोकस बदलकर ‘बीजेपी प्लस-प्लस’ (भाजपा की शर्तों पर गठजोड़ की राजनीति) कर दिया।
राजग का पल्ला सबसे पहले ओडिशा के नवीन पटनायक और आंध्रप्रदेश के चंद्रबाबू नायडू ने छोड़ा। उसी समय स्पष्ट हो गया था कि क्षेत्रीय दलों और भाजपा की दोस्ती पहले की तरह मज़बूत नहीं रह पाएगी। इन दोनों नेताओं को लग रहा था कि भाजपा उनकी सहयोगी कम और प्रतियोगी ज्यादा हो गई है। उनके ये अंदेशे सही थे। अगर नितिन गडकरी की भाषा का इस्तेमाल किया जाए तो मोदी के नेतृत्व में भाजपा ‘चप्पे-चप्पेे में भाजपा’ या ‘शत प्रतिशत भाजपा’ की नीति पर चल रही थी। इसीलिए देखते-देखते उसने महाराष्ट्र में शिवसेना से मुख्यमंत्री पद छीन लिया।
पंजाब में अकाली दल से बराबर की सीटें मांगने लगी। बिहार में नीतीश को भी भाजपा ने बराबर की सीटें देेने के लिए मजबूर कर दिया। भाजपा वैसी कांग्रेस बनना चाहती है जो किसी ज़माने में देश के हर प्रांत में सरकार बनाती थी। लेकिन, उस समय कांग्रेस की जीत और पराजित विपक्ष केे बीच वोटों का फासला 20% से ज्यादा होता था। इसके मुकाबले भाजपा और उसके विपक्ष के बीच कहीं कम है। विपक्ष साधारण एकता करके इस फासले को आसानी से पाट सकता है।
इसलिए जैसे ही विपक्ष में गैर-भाजपावाद की रणनीति परवान चढ़ी, नरेंद्र मोदी की पार्टी को राजग की याद सताने लगेगी। यह अलग बात है कि तब राजग उसकी मदद करने लायक नहीं रह जाएगा। (यह लेखक के अपने विचार हैं)
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