11 अक्टूबर को अमिताभ बच्चन का 78 वां जन्मदिन मनाया गया और मीडिया ने भी खबर प्रकाशित की परंतु उनकी सखी रेखा का जन्मदिन 10 अक्टूबर को अनदेखा रह गया। अमिताभ बच्चन ने कई बीमारियां झेली हैं। उन्हें ‘मायस्थेनिया ग्रेविस’ नामक बीमारी हुई। इसी बीमारी से जैकलीन कैनेडी के दूसरे पति एरिस्टोटल ओनेसिस की मृत्यु हुई थी। बाद में इसकी दवा का आविष्कार हो गया। रेखा ने अपने जीवन में गोपनीयता और निजता की रक्षा बड़े जतन से की है। उनकी एकमात्र मित्र सखा उनकी सचिव फरजाना हैं जो हमेशा पुरुषों का परिधान पहनती हैं।
मित्रता से अलग है सखी-सखा का रिश्ता जिसे समझने के लिए आपको धर्मवीर भारती की ‘कनुप्रिया’ पढ़कर राधा-कृष्ण के अनूठे रिश्ते की कुछ समझ विकसित हो सकती है। अमिताभ की पहली 11 फिल्में असफल रहीं। सलीम जावेद की पहली पटकथा ‘जंजीर’ को सितारों ने अस्वीकार कर दिया। निर्माता प्रकाश मेहरा को सलीम-जावेद ने मुश्किल सेे अमिताभ के साथ फिल्म बनाने के लिए राजी किया। तब इस चयन को आत्महत्या का प्रयास माना गया। सलीम-जावेद और अमिताभ ने 15 सफल फिल्में रचीं और ‘जंजीर’ से ‘शक्ति’ तक सफल यात्रा जारी रही।
दक्षिण के निर्माता पूर्णचंद्र राव ने अमिताभ के साथ कुछ फिल्में बनाई हैं, जिनमें के.भाग्यराज द्वारा निर्देशित ‘आखिरी रास्ता’ थी, जिसमें अमिताभ ने पिता-पुत्र की दोहरी भूमिकाएं अभिनीत कीं। पूर्ण चंद्र राव ने खाकसार को एक पटकथा लिखने के लिए चेन्नई आमंत्रित किया। समुद्र तट पर एकांत स्थान में बने बंगले में रहने की व्यवस्था की गई। उस बंगले की तमाम दीवारों पर अमिताभ और रेखा की बड़ी-बड़ी तस्वीरें लगी थीं। आभास होता था मानो उनकी अनदेखी मौजूदगी वहां हमेशा बनी रहती है। अमिताभ ने फिल्म ‘सात हिंदुस्तानी’ से अभिनय यात्रा प्रारंभ की और उसी वर्ष रेखा अभिनीत ‘सावन-भादो’ का प्रदर्शन हुआ।
दुलाल गुहा की ‘दो अनजाने’ में अमिताभ-रेखा ने अभिनय किया और यह यात्रा यश चोपड़ा की ‘सिलसिला’ तक जारी रही। अमिताभ के कठिन दौर में उन्हें भारत के एक पूंजीपति ने सलाह दी थी कि उन्हें अभिनय जारी रखना चाहिए क्योंकि यह काम उन्हें अच्छे से आता है। आदित्य चोपड़ा की ‘मोहब्बतें’ में बच्चन की दूसरी पारी प्रारंभ हुई, जिसमें ‘पिंक’ जैसी फिल्में शामिल हैं। हेमा मालिनी के साथ उनकी एक फिल्म का नाम था ‘बुड्ढ़ा होगा तेरा बाप’। उम्र के साथ बच्चन के अभिनय में प्रवीणता बढ़ती रही है। इस मामले में वे पुराने चावल और पुरानी शराब की तरह विरल माने जाते हैं।
यह कल्पना रोचक हो सकती है कि अगर जया बच्चन और रेखा की भूमिका में उलटफेर होता तो क्या होता? अनुमान है कि जया बच्चन भूमिका के उलटफेर को अपनी ‘गुड्डी’ वाली मासूमियत के साथ निबाह लेतीं परंतु बिंदास रेखा, पत्नी की भूमिका में घर की चाबियों के गुच्छे को अपनी साड़ी के पल्लू में बांधे नहीं रख पाती। प्रेमिकाएं स्वप्न समान और पत्नियां यथार्थ होती हैं। ज्ञातव्य है कि बच्चन और नेहरू परिवार का परिचय इलाहाबाद से प्रारंभ हुआ था। नेहरू ने ही हरिवंश राय बच्चन को राज्यसभा में मनोनीत किया था। कुछ समय हरिवंश जी ने विदेश विभाग के हिंदी विभाग में भी काम किया। राजीव गांधी और अमिताभ बच्चन गहरे मित्र रहे। अमिताभ बच्चन ने इलाहाबाद से चुनाव जीता परंतु राजनीति उन्हें रास नहीं आई।
क्या अमिताभ अपने पिता हरिवंश राय की तरह अपनी आत्मकथा लिखेंगे? यह संभव नहीं लगता। उनके पुत्र अभिषेक बच्चन बेबाक आत्मकथा लिख सकते हैं। ग़ौरतलब है कि अमिताभ ने सत्ता के विरुद्ध आक्रोश मुद्रा की भूमिकाएं अभिनीत कीं परंतु यथार्थ में वे सत्ता के साथ खड़े रहे हैं। जया बच्चन राज्यसभा में साहसी बयान देती हैं। बहरहाल अमिताभ बच्चन विगत आधी सदी से अभिनय कर रहे हैं। यह दृढ़ इच्छा शक्ति से ही संभव हुआ है।
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