अपने मुंह से स्वयं की प्रशंसा करना आत्मघात जैसा है। आत्मघात की यह परिभाषा कृष्ण ने दी थी। अपने ढंग से सभी योग्य होते हैं, पर कुछ लोगों की आदत पड़ जाती है अपनी योग्यता का ढिंढोरा पीटने की। यदि आपने कुछ अच्छा किया है तो उसका बखान दूसरे करें, तारीफ दूसरों के मुंह से हो, तब तो माना जाएगा कोई अच्छा काम है। लेकिन, हमारा स्वभाव होता है अपने किए का अपनी ही वाणी से प्रदर्शन करना।
किसी से बातचीत में जब हम अपनी ही प्रशंसा करने लगते हैं तो उस चर्चा में सामने वाले को स्पेस नहीं मिलता। कुछ समय बाद लोग हमारे प्रति उबाऊ हो जाते हैं। उन्हें लगता है इस व्यक्ति से बात करने से कोई मतलब नहीं है। यह तो सिवाए अपनी हांकने के दूसरों को कुछ बोलने का अवसर ही नहीं देता।
पतंग, गिर्री और मांझा आपका हो सकता है, पर आसमान आपका नहीं हो सकता। वहां सबकी पतंगें उड़ती हैं। जब कोई पतंग कट जाए तो खेल मानकर खुश हो जाना, पर अहंकार मत पाल लेना। कटता मांझा है, घायल लोगों का अहंकार हो जाता है। अनियंत्रित अहंकार अपनी ही वाणी में उतरकर स्वयं की प्रशंसा कराता है। तो प्रयोग करिए कि जब भी किसी से बात करेंगे, अपने ‘मैं’ को बहुत छोटा रखेंगे।
Download Dainik Bhaskar App to read Latest Hindi News Today
from Dainik Bhaskar https://ift.tt/3dweinm
via IFTTT https://ift.tt/343K8oC
No comments: