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सिर्फ उच्च शिक्षित होने से ही आम लोगों की मदद करने वाला कोई आविष्कार नहीं किया जा सकता, इसके लिए लोगों के प्रति हमदर्दी और समय जरूरी

आ प शिक्षित न हों, फिर भी किसी चीज की खोज कर सकते हैं! दुनिया को चौंकाने के लिए आपको सिर्फ किसी पीड़ित के प्रति बहुत हमदर्दी और खोज पर काम करने के लिए थोड़े समय की जरूरत है! यकीन मानिए आपको समाधान मिल जाएगा। सातवीं कक्षा में स्कूल छोड़ चुके, गुजरात के जामनगर के रोहित करेलिया और बारहवीं तक पढ़े, केरल के कोट्‌टयम के डेनिस मैथ्यूज ने अपनी नई खोजों से यही साबित किया है।

गुजरात के खोलवाड नामक छोटे से गांव में 45 वर्षीय रोहित एक छोटी इंजीनियरिंग वर्कशॉप का मालिक है। वहीं 29 वर्षीय डेनिस केरल के इरट्‌टूपेट्‌टा गांव में ट्रक ड्राइ‌वर है।

रोहित की छोटी-सी फैक्टरी में 20 कर्मचारी काम करते हैं, जिसमें 10 सीलिंग और पांच पेडस्टल पंखे हैं। चूंकि उनका काम मेहनतभरा है इसलिए ये पंखे ठंडक देने या हवा का बहाव बनाए रखने के लिए पर्याप्त नहीं थे। जबकि इस साल मार्च का महीना भयंकर गर्मी का संकेत दे रहा था।

डेनिस ने कुआ खोदने वाले अपने दोस्त प्रमोद को कुआ और तालाब खोदते समय हाथ से मलबा उठाने में संघर्ष करते हुए देखा। उसे अहसास हुआ कि कुआ खोदने में सबसे मुश्किल काम मिट्‌टी, पत्थर और कीचड़ हटाना है। अपने माता-पिता के साथ सूरत से 30 किमी दूर रहने वाले रोहित अविवाहित हैं। उन्होंने ऐसा सीलिंग फैन बनाने की ठानी, जो 360 डिग्री घूम सके, जिससे उनके कामगारों को राहत मिले। जबकि डेनिस ने तय किया कि वे कबाड़ में पड़ी एक बाइक के पेट्रोल इंजन का इस्तेमाल कर छोटी क्रेन बनाएंगे।

दोनों को ही लॉकडाउन का लाभ मिला, जिससे उन्हें अपने आइडिया को पंख देने के लिए काफी समय मिल गया। दोनों की माली हालत कमजोर थी लेकिन उनका आत्मविश्वास मजबूत था।

रोहित ने घूमने वाले सीलिंग फैन पर अपने ही तरीके से काम किया। लेकिन पंजीकृत पेटेंट अटर्नी अनिल सारोगी को रोहित के आविष्कार का अध्ययन करने में तीन महीने लगे! शोध के दौरान अनिल को अचानक स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर का जायरोस्कोपिक सिद्धांत पर एक लेक्चर मिला। तब उन्हें यह समझ आया कि रोहित का आइडिया वैज्ञानिक रूप से कैसे काम कर रहा है।

इसीलिए रोहित का आविष्कार सुरक्षित करने के लिए पेटेंट कोऑपरेशन ट्रीटी (पीसीटी) के तहत अनिल, रोहित का मामला इंटरनेशनल पेटेंट के लिए ले गए। घूमने वाले सीलिंग फैन को बनाने की लागत करीब 4000 रुपए आई।

डेनिस ने बचपन से ही काफी मशीनें देखीं क्योंकि उसके पिता मैकेनिक थे। इसलिए उसने पुरानी हीरो होन्डा बाइक का 100 सीसी का इंजन इस्तेमाल किया। चूंकि बाइक में रिवर्स गियर नहीं होता, इसलिए उसने ऑटोरिक्शा का गियरबॉक्स इस्तेमाल किया। करीब 90% सामान कबाड़ से ही लिया।

क्रेन 250 किग्रा तक उठा सकती है और 70 फीट की गहराई तक जा सकती है। यह एक लीटर पेट्रोल में 1.5 घंटे लगातार चल सकती है। एरनाकुलम के अग्निशमन और बचाव दल के अधिकारियों ने भी क्रेन का निरीक्षण किया है। वे इसकी कुशलता से संतुष्ट थे। इसकी कीमत करीब 60 हजार रुपए है।

रोहित ने अपने पंखे का व्यावसायिक उत्पादन शुरू करने का फैसला लिया है और पार्ट्स के लिए पहले ही डाई बना ली हैं। डेनिस को भी आस-पास की पंचायतों से ऐसी ही और क्रेन बनाने के ऑर्डर मिलने लगे हैं।
फंडा यह है कि सिर्फ उच्च शिक्षित होने से ही आम लोगों की मदद करने वाला कोई आविष्कार नहीं किया जा सकता। इसके लिए लोगों के प्रति बहुत हमदर्दी और कुछ समय की जरूरत होती है।



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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु।


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सिर्फ उच्च शिक्षित होने से ही आम लोगों की मदद करने वाला कोई आविष्कार नहीं किया जा सकता, इसके लिए लोगों के प्रति हमदर्दी और समय जरूरी सिर्फ उच्च शिक्षित होने से ही आम लोगों की मदद करने वाला कोई आविष्कार नहीं किया जा सकता, इसके लिए लोगों के प्रति हमदर्दी और समय जरूरी Reviewed by Unknown on October 15, 2020 Rating: 5

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