ए क बार मैंने मशहूर क्रिकेटर अनिल कुंबले से पूछा कि ‘उन 10 लोगों का क्या हुआ जो आपके साथ बचपन में क्रिकेट खेलते थे?’ उन्होंने कहा, ‘बैंगलोर, जहां मैं पैदा हुआ, वहां मौसम अजीब रहता है। अचानक बारिश हो जाती है, वह भी एक मोहल्ले में होती है, दूसरा सूखा ही रहता है। बारिश होती तो मेरे दोस्त घर चले जाते।
अगर एक मोहल्ले में बारिश होती तो मैं दूसरे में चला जाता। सभी को मेरा खेलना अच्छा लगता क्योंकि मैं बॉलर था और बैटिंग की चांस नहीं छीनता था।’ बारिश हो या धूप, क्रिकेट के लिए कुंबले की दीवानगी ने ही उन्हें राष्ट्रीय खिलाड़ी बनाया।
बेंगलुरु की गलियों से कुंबले के अलावा भी कई लोग आए हैं। पोस्टडॉक्टोरल रिसर्च साइंटिस्ट अनुराधा डोड्डबल्लापुर, टेलीकम्युनिकेशन इंजीनियर कार्तिका विजयराघवन और एक हाईस्कूल टीचर शरण्या सदारंगिनी का उदाहरण ही ले लीजिए।
तीनों ने बतौर गली क्रिकेटर शुरुआत की लेकिन उनके सपनों ने जर्मनी में आकार लिया। ये तीनों अभी जर्मन नेशलन विमन्स टीम का हिस्सा हैं, जहां अनुराधा दुनिया की 25वीं सर्वश्रेष्ठ साइड की कैप्टन हैं। तीनों ने कभी सोचा नहीं था कि वे खेल में कॅरिअर बनाएंगी।
अनुराधा ने गली-मोहल्ले में क्रिकेट शुरू किया। 12वीं में पहुंचने तक उनका व्यवस्थित क्रिकेट से परिचय नहीं हुआ था। उनका जोर पढ़ाई पर रहा और क्रिकेट शौक बना रहा। अंतर सिर्फ यह था कि क्रिकेट उनका एकमात्र शौक था। उसने उन्हें कर्नाटक अंडर-16 और अंडर-19 के साथ स्टेट सीनियर टीम तक पहुंचाया।
फिर 2008 में अनुराधा मास्टर्स डिग्री के लिए इंग्लैंड चली गईं। न्यूकैसल में काम करते हुए वे लीग के लिए स्थानीय क्लब से जुड़ीं और फिर काउंटी गेम के लिए चुनीं गईं। कार्डियोवस्कुर रिसर्च में डॉक्टरेट उन्हें 2011 में जर्मनी ले गई। रिसर्च स्टडी तनावपूर्ण थी लेकिन क्रिकेट के बिना जिंदगी मुश्किल थी।
उन्हें विमन्स नेशनल टीम मिली, जो 2010 में कोलोन में बनी थी। अनुराधा ने उनसे संपर्क किया और हंगरी में हुआ टी20 यूरोपियन कप उनका पहला टूर्नामेंट था। अनुराधा 2017 में कप्तान बनीं और पिछले महीने टी20 इंटरनेशनल्स में 4 गेंद पर 4 विकेट लेने वाली पहली महिला बनीं।
कार्तिका को क्रिकेट का जुनून था, लेकिन उनका हुनर बेंगलुरु के इंदिरानगर के बाहर नहीं निकल पाया था, जहां वे रहती थीं। एक हेल्थ इंश्योरेंस कंपनी में एप डेवलपर कार्तिका 2015 में शादी के बाद जर्मनी के स्टटगर्ट चली गईं।
कार्तिका के पति विजयराघवन ने उन्हें फिर क्रिकेट खेलने के लिए प्रेरित किया। अक्टूबर 2017 में उन्होंने स्थानीय क्लब के लिए खेलना शुरू किया। 2018 में नेशनल टीम में डेब्यू किया। अगले साल उन्हें विकेटकीपर की जिम्मेदारी दे दी गई।
कर्नाटक की अंडर-19 क्रिकेट टीम में रहीं 25 वर्षीय शरण्या लिबरल आर्ट्स में बैचलर डिग्री के लिए एसेक्स गईं। फिर 2017 में जर्मनी आ गईं और दो हफ्तों से भी कम समय में उन्होंने अंग्रेजी पढ़ाना और डॉयशर क्रिकेट बंड के युवाओं को कोचिंग देना शुरू कर दिया।
शरण्या ने डेनमार्क में क्लब के लिए भी खेला और 2020 में जर्मन नेशनल टीम में डेब्यू किया। आज बेंगलुरु की तीनों महिलाएं जर्मन (ईगल) नेशनल जर्सी पहन रही हैं। हालांकि वे हमेशा भारत के लिए खेलने का सपना देखती हैं।
फंडा यह है कि इन तीनों महिलाओं की तरह आपका कॅरिअर भी सुनाने लायक कहानी बन सकता है, अगर आप अपने शौक को सफलता दिलाने के लिए सपनों को जिंदा रखें।
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